Contemporaries तृप्तियां
Contemporaries तृप्तियां हमारी दुनिया🌎⚽🥥🥞🎈 गोल हो! चौकोर हो! या त्रिकोण हो! अंडाकार हो! या आलूकार हो! इसका आकर्षण🎡🌞 बल हमें हमारे दुनिया से जोड़कर रखता है। पक्षी या परी अपने पंखों के साथ भी इससे अलग होकर अपना अस्तित्व बचा नहीं सकते। इसे कहते हैं अपने दुनिया से जीवन का संबंध है। जो खोया-पाया यहीं पर खोया-पाया, जो क़र्ज़ जिसके लिए लिया, उसी के लिए वहीं पर चुकाया। बचपन-पचपन(55) बीता सब एक जैसा, “राम-भरोसे”। आगे होगा जीवन कैसा? इसकी भी चिंता आप करोगे।। हे राम! हे सीता! सूक्ष्म रूप और विशाल सोच-समझ का धन है मेरा मन। इसकी उपज को बेच-बेच खड़ी कर दूं बहु मंजिला भवन।। “कर भला तो हो भला” रट लगाऊं आजीवन।।। जो पाया यहीं से पाया जो खोया यहीं पर खोया सफल जीवन का किया हवन।।।। शर्मा-बेशर्मा बनकर संघर्ष किया और अब मृत्यु मिले या मोक्ष अपने सिर पर खुद बांधा कफन।।।।। हमारी सोच ने हमारे प्रथम स्वर्ग रूपी दुनिया को नर्क बना दिया है क्या-जाने कहां-कहां? बताओ आप कुछ भी यहां, पाओ आप कुछ भी यहां किंतु जो शांति और संतुष्टि तारों में है वो गांव-शहर के यारो-पारो में नहीं है। आ...